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शुक्रवार, 24 मार्च 2017

रानी और आज के रणबांकुरे

रानी पद्मावती पर बनती फिल्म पर हंगामा अकारण नहीं था। बात सिर्फ अभिव्यक्ति की नहीं थी। यह बात समझनी चाहिए। 
विसुअल मीडिया इतिहास और मान्यताओं को बदल कर रख देता है। जो सही नहीं, वह सही बन जाता है। इस पॉइंट को समझना चाहिए। 
मुगले आज़म बनी थी। अनारकली और सलीम का प्रेम सदा के लिए अमर हो गया। ऐतिहासिक रूप से यह सत्य नहीं। बल्कि इससे अच्छी फ़िल्म तो संजय खान की "ताजमहल"थी जिसमे अर्जुमंद बानो बेगम के ही बहाने ही सही, नूरजहाँ का वास्तविक चरित्र दिखलाया गया।

रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी ने भी ऐतिहासिक तथ्यों का व्यतिक्रमण किया था। हालाँकि इसे इस बात की छूट दी जा सकती है कि फिल्म का भाव सही रहा। श्याम बेनेगल की द मेकिंग ऑफ़ महात्मा कहीं अच्छी फिल्म रही। 
मगर यह बात अन्य ऐतिहासिक पात्रों पर बनी फिल्मों के प्रति सही नहीं कही जा सकती। न अम्बेडकर ,न पटेल, न सावरकर, न भगत सिंह और न ही मॉन्टबेटन पर बनी फिल्मों ने न्याय किया है। श्याम बेनेगल की सुभाष पर बनी फिल्म ऐसे में अच्छी कही जा सकती है।

अभिव्यक्ति के तहत सब जायज है!
ऐसे में यदि विरोध होता है तो उसपर ध्यान देना चाहिए। क्यों और किस कारण से लोग भड़क रहे, यदि यह समझा नहीं जाता तो दरअसल सत्य, सत्य होकर भी सत्य नहीं होता और जिस असत्य को सत्य बनाने का प्रयास हो रहा होता है, वह भी सत्य - असत्य की परिधि से निकलकर भावनाओं में बंट जाता है। 
अंततः सत्य भावनाएं ही होती हैं, तथ्य नहीं। यह बात समझने के लिए वैज्ञानिक नील्स बोह्र और आइंस्टीन की बहस पढ़नी चाहिए। 
नई फिल्म आ रही है-वाइसरॉय हाउस।बनानेवाली भारतीय हैं मगर इस फिल्म के रिव्यु ऐसे दिखा रहे हैं मानो माउंटबेटन ने भारत को मुक्ति दिलाई। भारतीय नेता पिछड़े हुए थे। पता नहीं स्क्रिप्ट राइटर ने शायद कैम्ब्रिज हिस्ट्री ही पढ़ी हो जो ब्रिटिश द्वारा द्वारा किए अन्यायों में भी सभ्यता को ऊँचा बनाने के पहलु ढूंढ लेती है। कैम्ब्रिज हिस्ट्री इंग्लैंड का राष्ट्रवादी इतिहास लेखन है जो हर हाल में राष्ट्र को अच्छा दिखाता है। भारत का तथाकथित राईट विंग इसे बुरा मानते हुए भी बुरा नहीं मानेगा। 
अभिव्यक्ति अधिकार है मगर साथ में एक जिम्मेदारी भी। जिम्मेदारी का भाव अधिकार के पहले आना चाहिए। नहीं होता ऐसा। सबका यही हाल है।

बी प्रैक्टिकल !

थैंक यू फॉर 90 वोट्स।
इरोम को हारना तो था ही। आज नहीं तो कल। भावनाओं पर एक बार-दो बार चुनाव जीते जा सकते हैं, इससे ज्यादा नहीं।पीछे कंस्ट्रक्टिव वर्क का आधार रहने से सम्भावना बनती है। यहाँ तो यह भावनाएं भी अनशन तोड़ने से और विवाह कर लेने से टूट चुकी थीं। ऐसा ही है संसार।

बात तो यह भी है कि लोग इस हार के मजे लेते हुए दिख रहे हैं। कारण यह कि वह सेना के विशेषाधिकार वाले कानून के विरोध में थी और कथित वामपंथी धड़े का समर्थन उसे प्राप्त था। "बी प्रैक्टिकल" से लेकर अखंडता-सुरक्षा के तमाम बहाने मौजूद रहते हैं। लगता है अखंडता और सुरक्षा के स्वयंभू ठेकेदार वही हैं !
विरोध होना ही चाहिए। आर्मी के नाम पर राष्ट्रवाद चमकानेवाले बाकियों के मुंह तो बंद कर न पाएंगे पर ऐसे ही राक्षसी ठहाके लगाएंगे।
कोई कानून सही है या गलत , इसपर कई तरह के विचार हो सकते हैं। अक्सर कानून उतना काम नहीं करता जितना जनचेतना काम कर जाती है। कई तरह की बातें हैं । सारी बातों का समुच्चय ही सही पिक्चर दिखा सकता है। मगर यदि केवल एक का कहना ही सही माना जायेगा तो ऐसे में अल्पमत में रहना श्रेयस्कर है।
समाज का पतन एक दिन में नहीं होता। और जब होता है तब दिखता नहीं। आज भी रावण रामनामी चादर ओढ़े साधु का वेश बनाकर आता है।

आइडियोलॉजी


आज उस ऐतिहासिक नरम दल के सापेक्ष सभी अनायास ही खड़े हैं क्योंकि सिर्फ चुनावी राजनीति पर विश्वास नरम दलीय ही बनाता है। अपने आइकॉन बनाने की छूट तो हर काल में थी। भले अपने आइकॉन गरम दल वालों को बना लें, आज उस समय के हिसाब से हर दल नरम दलीय है। 
अम्बेडकर ने तो किसी भी प्रकार के "गैर-लोकतान्त्रिक" मार्ग को अपने संविधान सभा के अंतिम भाषण में अनुचित बताया था । पर यह गैर-लोकतान्त्रिक मार्ग क्या हो सकता है, इसपर चर्चा न हुई कभी। वह सत्याग्रह "और" पैसिव रेजिस्टेंस को भी अनुचित बताते हैं, हिंसक मार्ग तो अनुचित हैं ही। यह लिबरल आइडियोलॉजी थी, शायद जे एस मिल की। 
कोई पार्टी इस लाइन को क्रॉस नहीं कर सकी है। लोग करते हैं। वह "नरम दलीयों", जो सभी हैं, द्वारा एंटी नेशनल ही घोषित होंगे। हाँ, शांत, बिना हिंसा के हुआ प्रतिरोध भी। 
संकेत किधर है, समझना आसान है। इस देश में शान्त, अहिंसक प्रतिरोध भी आपको देशद्रोही बना सकता है यदि वह संसद या न्यायालय के माध्यम से न हो। संसद और जुडिशरी की अतिप्रभावशाली प्रणाली से सभी वाकिफ हैं ही !! चुप रहना ही बेहतर है। 
जो लोग लिबरलिस्म का विरोध करते दिखते हैं , दरअसल वह स्वयं लिबरल के एक प्रारूप हैं। उनको पता नहीं चलता।

आइंस्टीन और गाँधी

शायद आज आइंस्टीन से सम्बंधित तिथि है। उनके "साइंस, फिलोसोफी, और रिलिजन" आर्टिकल को पढ़ना चाहिए। नील्स बोह्र से उनकी क्यों नहीं बनती थी, यह बात दर्शन के अंदर घुस कर ही पता चल सकती है। बहरहाल दो पुरानी पोस्ट.... भारत से सम्बंधित।
गांधी के निंदक (आलोचक नहीं ) आइंस्टीन की गांधी के प्रति श्रद्धा से बहुत दुखी थे। 13 दिसम्बर 1948 को अम्बाला के एक भौतिकी प्राध्यापक ने इसी क्रम में आइंस्टीन को एक पत्र लिखा। लिखा कि कैसे उनके ऐसा एक रेशनलिस्ट उस इर्रेशनलिस्ट गांधी के प्रति तनिक भी श्रद्धा रख सकता है , वह गांधी जो वैज्ञानिकता का सबसे बड़ा शत्रु है। प्रोफेसर साहब आगे लिखते हैं कि गोडसे और आप्टे उनके अर्थात आइंस्टीन के प्रति महती श्रद्धा रखते हैं और आप्टे तो उनकी थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी गोडसे को लगातार पढ़ाते रहते हैं ( आप्टे विज्ञानं शिक्षक था ) .
आइंस्टीन ने पत्र का उत्तर बखूबी दिया।
"मैंने आपका 13 दिसंबर वाला पत्र देखा और अच्छी तरह से आपकी प्रवृति को भांप गया। मैं आपसे सहमत नहीं हो सकता। यह सत्य हो सकता है कि गांधी एक सीमा तक एंटी रेशनलिस्ट हो सकते हैं किन्तु गांधी की विशिष्ट महानता उनकी नैतिकता और उसके प्रति अद्वितीय समर्पण में है। इसकी थाह नहीं लगाई जा सकती कि उन्होंने अहिंसा के प्रति भारतीयों को प्रवृत करके क्या प्राप्त किया। मेरा विश्वास है कि विगत शताब्दियों के राजनैतिक क्षेत्र में यह अबतक सबसे बड़ी उपलब्धि है- सिर्फ भारत के लिए ही नहीं , बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए। गांधी की आत्मकथा मानवीय उत्कृष्ठता के महानतम प्रमाणों में से एक है।
क्या आप सोंच सकते हैं कि मैं आपकी इस रवैये से कितना चकित हूँ यह जानते-समझते हुए भी कि आपको गांधी की महानता की सही समझ नहीं। क्या आप ऐसा विश्वास करते हैं कि अपने से अलग राय रखनेवाले की हत्या न्यायसंगत है ? "
...….................................
क्या मैं आपसे एक प्रश्न पूछ सकता हूँ , डॉ आइंस्टीन ?
सवाल जर्मन में था और पूछनेवाला एक भारतीय। 
 प्रश्नकर्ता ने सवाल जारी रखते हुए कहा कि पॉलिटिक्स के बारे में नहीं है। मैं यहाँ आपसे कुछ सीखने के लिए आया हूँ और पॉलिटिक्स के बारे में मुझे लगता है कि मेरे पास भी आपको देने के लिए कुछ है। लेकिन मानव मस्तिष्क के उच्चतर स्तर पर हमें आपकी जरुरत है। भारत में मैं कहा करता हूँ कि हमारी शताब्दी में केवल तीन महान हुए हैं - महात्मा गांधी , बर्नार्ड शॉ और आप। बर्लिन में मैंने कहा था कि हमारे समय में केवल दो बार सोंचा गया , महात्मा गांधी और परमाणु ऊर्जा। एक जा चुके हैं और आपकी खोज मृत्यु का स्रोत बना बैठा है। मानव मस्तिष्क को इस ठहराव से कैसे बाहर निकाला जाए ? क्या आप कोई नया जुड़ाव देखते हैं जो विचारों को मुक्त कर उन्हें खोजों की नई यात्रा पर भेजे ?

बातें और भी हुईं। जब दोनों अलग होने लगे तो आइंस्टीन ने कहा -‘It is so good to meet a man – one gets so lonely.’
हाँ , बातें अब इंग्लिश में होने लगी थीं। 
प्रश्नकर्ता राममनोहर लोहिया थे।

फतवा

फतवा अलग क्यों लगता है ? एक मध्ययुगीय प्रणाली! फतवे के विषयवस्तु को लेकर उठते सवाल जरुरत हैं, जायज हैं, मगर पूरी अवधारणा पर ही प्रश्न !
जब मजहब और सो कॉल्ड साइंस का डाइवोर्स नहीं हुआ था तब ऐसी ही अवधारणाएं समाज को एक सूत्र में बांधकर सुचारू रूप से चलाने का काम करती थीं। हुआ यह कि उत्तरोत्तर भौतिक प्रगति के साथ लोगों को रिलिजन बकवास लगने लगा। कुछ गड़बड़ रिलिजन में भी रही। स्टेट नामक नए मजहब ने पुराने मजहबों को प्रत्यस्थापित किया । ऐसे में फतवो के नए प्रकार ने पुराने प्रकार के हर फतवों को बेकार सिद्ध किया। हित में था। हालांकि एक जरुरत भी थी शुरुआत में। किंतु इस हस्तक्षेप ने फतवों या इस प्रकार की हर संकल्पना को और अधिक भ्रष्ट कर दिया। आज वही नजर आते हैं।
आज कोर्ट संविधान के आधार पर सलाह देता है । मौलिक अधिकार है यह। जातिगत सभाएं होती हैं ,उनमे फैसले होते हैं कि किस पार्टी को वोट देना है। क्या यह फतवा का ही एक प्रारूप नहीं ? व्हिप जारी किये जाते हैं। इधर नित्य देशद्रोही, काफ़िर घोषित करने का आह्वान किया जाता है। क्या यह फतवा का प्रारूप नहीं ? कभी पंचायतें फैसला करती थीं जो बाध्यकारी होती थीं। तुलनाएं भरी पड़ी हैं। आज बस पुराने फतवा शब्द के स्थान पर नए प्रगतिशील दिखनेवाले शब्द आ गए हैं ।
हाँ, मानवतावादी संकल्पनाएँ आ गई हैं जो पुराने फतवों से नदारद थीं । मगर समझने की बात यह है कि उस काल के विचार उस काल की विशेषताएं थीं। वह हर क्षेत्र में दिखती थीं।
फतवा सलाहकारी है या बाध्यकारी, यह महत्त्व का होते हुए भी अवधारणा के प्रश्न पर महत्वहीन है। अपने ही अतीत से वैर क्यों ? अपने ही वर्तमान को क्यों नहीं देखते ? स्वीकार करें, सुधार करें, इसे दुत्कारना उन्हें अधिक भ्रष्ट बनायेगा.... पीछे ले जायेगा। प्रगतिशीलता जितना ही अधिक उन्हें मध्ययुगीय कहकर दुत्कारेगी, वह उतने ही कूपमंडूक होते जायेंगे।

हर्बर्ट स्पेंसर


हर्बर्ट स्पेंसर को अपने "सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट" कांसेप्ट के लिए जाना जाता है। डार्विन को इस बात से बल मिला। यह थ्योरी इनके द्वारा लिखित "प्रिंसिपल्स ऑफ़ बायोलॉजी" से ग्रहण की गई है । 
पर इसी किताब में इन्होंने यह भी लिखा है कि "फ्लैट-चेस्टेड गर्ल्स" जिनपर शिक्षा का अत्यधिक दबाब पड़ता है, उत्तम कोटि के शिशुओं को धारण करने और उनको फीड करने में असमर्थ रहती हैं। 
यहाँ दोनों कथनों को एक दूसरे के विरुद्ध रखने की कोशिश नहीं की है। यह भी ज्ञात है कि सही धारणा बाद में धीरे धीरे आई। सवाल यह है कि "सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट( नेचुरल सिलेक्शन)" और "फ्लैट-..." वाली "साइंटिफिकली प्रूव्ड" बातों में सोसाइटी ने किसे आसानी से जन्म दिया या ग्रहण किया होगा - साइंस के नाम पर ? 
साइंस कल भी एक कल्चरल प्रोडक्ट था और आज भी है। साइंटिफिक टेम्पर के नाम पर कुछ भी स्वीकार कर लेना कहीं से भी साइंटिफिक नहीं। जरुरी नहीं कि हम जिसे साइंस समझते हों, वह साइंस ही हो।

औपनिवेशिक विज्ञान

1923 में एक कमिटी बनी थी-मोहम्मद उस्मान कमिटी। यह मद्रास इन्क्वायरी कमिटी के नाम से जानी जाती है। 
इस कमिटी ने पारंपरिक स्थानीय मेडिकल प्रैक्टिशनर के पक्ष को "साइंटिफिक" यूरोपीय एलोपैथिक प्रणाली के समक्ष प्रश्नोत्तर शैली में खड़ा किया था। 
"यदि हम अपने चिकित्सा विज्ञान के बारे में बात करते हैं तब वो आश्चर्यचकित होकर पूछते हैं कि क्या ऐसी भी कोई चीज है ? बजाय इस सवाल के यह सहमति आवश्यक है कि हिन्दू भी "आदमी" होते हैं और वो भी एक मजहब रखते हैं , एक भाषा रखते हैं, एक विज्ञान जानते हैं और एक प्राचीन सभ्यता के वंशज हैं । "

यह उस्मान कमिटी की रिपोर्ट के अंश हैं।
सवाल अहम् है। विज्ञान औपनिवेशीकरण का एक सशक्त माध्यम रहा है। तत्कालीन यूरोपीय वैज्ञानिक सोंच ने भारतीय आयुर्विज्ञान को अवैज्ञानिक माना क्योंकि वह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं थे, उनका पेटेंट नहीं हुआ था। 
प्रतिक्रिया हुई। कुछ लोगों ने यह प्रयास किया कि वैद्यगिरी और हकीमगिरी को यूरोपीय "वैज्ञानिक" चिकित्सा प्रणाली के समक्ष वैज्ञानिक सिद्ध किया जाए। इन लोगों ने यह कहा कि आर्युर्वेदिक प्रणाली स्थानीय और विशेषतः निर्धन जनता के लिए अधिक उपयुक्त है। उन्होंने यह तर्क दिया कि उनको उपचार के लिए आइसबर्ग ,थर्मामीटर, बार्ली, माल्टेड मिल्क ,चिकन की आवश्यकता नहीं ,वह अपने घर के पिछवाड़े में जन्मने वाले पौधे से उपचार करने में सक्षम हैं। 
यह तर्क तत्कालीन साइंटिफिक सोंच को मान्य न हो सका। आज भी नहीं होगा। वह मानने के लिए ही तैयार नहीं थे कि इस " ग्रामीण संस्कृति" में विज्ञान नाम की कोई चीज भी हो सकती है। और इसमें सहयोग किया तत्कालीन मध्यम वर्ग ने। 
प्रतिक्रियाएं कई तरह की हुईं। एक ऊपर लिखी है। दूसरी इसी का विस्तार है। पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों ने स्वयं को वैज्ञानिक दिखाने के लिए प्रयास करने शुरू कर दिए। उनका ध्यान चिकित्सा से हटकर स्वयं को सिद्ध करने में ही अटक गया। आगे की प्रगति रुक गई और वह एलोपैथिक प्रणाली के इशारे पर नाचनेवाले बनकर रह गए। यह पराभव का निम्नतम स्तर था जब नई खोजें रोगों के निदान हेतु न होकर उनको वैज्ञानिक सिद्ध करने के लिए की जाने लगीं। ।
गांधी का जिक्र आवश्यक है क्योंकि वही एक थे जिन्होंने इस प्रवृत्ति को पहचानकर तत्कालीन चिकित्सा प्रणाली को नकारते हुए प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाने की सलाह दी। हिन्द स्वराज में तो वह भारत के डॉक्टरों को अभिशाप मानते हैं। 
खैर, बात महत्वपूर्ण यह है कि विदेशी hegemonic science ने स्थानीय साइंस को बेकार सिद्धकर अपने को स्थापित किया। स्थानीय प्रणाली भी प्रतिक्रियावश भ्रष्ट हो गई। उसे अपने को सटीक सिद्ध करने के बजाय अपने को वैज्ञानिक सिद्ध करने में अधिक रुचि होने लगी थी। सिद्ध करने की जरुरत ही क्या थी ? 
समय सबको बदलकर रख देता है।

सबका साथ सबका विकास

जड़ से साफ़ न करो तो
पीपल के कोमल पौधे
दरख्त बन दीवारों को तोड़ जाते हैं।
अगर सर्जरी न करो तो
मरहम से मिटाया घाव
वक्त के नासूर बन जाते हैं।
कोई मुद्दा छोटा-पुराना नहीं होता।
प्राथमिकता बनाना अलग बात है, फिर भी,
दबाये गए मुद्दे फिर उभर आते हैं।
वक्त के साथ इनकी फितरत भी है बदलती।
ये समाधान नहीं हैं खोजते फिर, बल्कि,
अहमों के टकराव बनकर रह जाते हैं।
बात इतनी भी होती तो चल जाता।
एक बार भिड़ लें, फिर मामला संभल जाता।
आते हैं जब तीसरे मध्यस्थ, कहीं से,
मामले और उलझ-बिगड़ जाते हैं।

बिहार दिवस पर

बिहार की सबसे बड़ी खूबी प्रतिरोध की संस्कृति के होने में रही है। ये प्रतिरोध सफल भी रहे। उदाहरण भरे पड़े हैं।
एक राजा के रूप में उस समय छाये हुए प्रवृतिवाद से मुक्त हो निवृति का मार्ग दिखानेवाले विदेह जनक हों या स्वयं उनकी पुत्री सीता जिनके पुत्रों ने राम के अश्वमेघ अश्व को बाँध लिया, सांकेतिक प्रतिरोध के सूचक रहे हैं।कृष्ण के समय उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी राजगृह का जरासंध ही था। 
जब संपूर्ण देश में एक संस्कृति , एक विचार का वास हो गया तब प्रतिरोध का सशक्त ज्वार महावीर और बुद्ध के माध्यम से उठकर संपूर्ण विश्व को नई दिशा दे गया।

फिर हम चाणक्य और चंद्रगुप्त को क्यों भूलें ? खंड-खंड विभक्त गणतंत्रात्मक एवं राजतंत्रात्मक भारतभूमि को सर्वप्रथम एकीकृत करने का बीड़ा इसी मिट्टी ने उठाया और जब इस क्रम में भारतवर्ष सतत युद्धों के कारण क्षत-विक्षत और शोणितमय होने लगा तब यहीं के एक चक्रवर्ती सम्राट ने न भूतो न भविष्यति कार्य करते हुए स्वयं को सामने रखते हुए धम्म का प्रसार किया। 
यह प्रतिरोध धर्म के क्षेत्र में था तो विज्ञान की धारा भी आर्यभट्ट और वराहमिहिर सदृशों से अछूती न रही।

अपने चरम पर रहे मुगलों को राजनैतिक और नीतिगत रूप से जितना शेरशाह सूरी ने प्रभावित किया उतना उस वक्त किसी के बस का नहीं था। 
प्रथम अहिंसक सत्याग्रह भी तो यहीं हुआ। सत्याग्रह, जिन प्रदेशों में सबसे ज्यादा उफान पर था ,बिहार उनमें अग्रगण्य है। बिहार-एक राज्य के रूप में भी तो एक प्रतिरोध के उपरांत ही आया। आज़ादी के बाद भी, जयप्रकाश आंदोलन यहीं मुखरित हो केंद्रीय सत्ता को हिला गया। उदाहरण तो वर्तमान का भी है।

इस संस्कृति को बनाये रखना ही बिहार की पहचान है। सफलता- असफलता अधिक मायने नहीं रखती। असफ़ल होकर भी कोई बहुत कुछ बदल डालता है। हालांकि इस क्रम में मजाक उड़ने से लेकर हर तरह का दोषारोपण भी झेलना पड़ता है। आर्थिक विपन्नता सामने खड़ी हो जाती है। फिर भी प्रतिरोध ही वह संस्कृति है जो भविष्य का दिशा-निर्धारण करती है। 

राम

राम किसी भी संस्कृति, किसी भी समूह-समुदाय से परे हैं। वह तुलसी के राम हैं और नहीं भी हैं। उनका जन्म अयोध्या में होकर भी नहीं हुआ । उनके पिता दशरथ हैं भी और नहीं भी। अभिमन्यु का प्रसंग स्मृति में आता है । अभिमन्यु मर चुका था। अर्जुन से इस दुःख के कारण लड़ा नहीं जा रहा था। कृष्ण उसे स्वर्ग में अर्जुन से मिलवाने ले गए। अभिमन्यु ने प्रणाम तक न किया। कहा कि न जाने किस जन्म में मैं आपका पिता रहा होऊंगा। जब अभिमन्यु और अर्जुन बहुल हो सकते हैं तो राम की लीला कैसे समझी जा सकती है ? बालकाण्ड के "नाना भांति राम अवतारा" से लेकर " हरि अनंत हरि कथा अनन्ता" की बातें अनंत न होते हुए नही अनंत हैं । इसपर भी जानने का दावा किया नहीं जा सकता।
तो वो कौन लोग हैं जो राम को देश-काल से बाँधने की कोशिश करते हैं ! वह जो जानने का दावा करके उनको सीमित करने की कोशिश करते हैं !! कोर्ट में खड़ा कर देते हैं !!! क्या मजाक है! जिन्होंने मंदिर तोड़ा या ना तोड़ा ,उससे ज्यादा अपमान तो आप कर देते हैं । वह भी भक्त होने का दावा करते हुए। 
वह "अपराधी" होता है जो महिमा न जानते-समझते हुए विध्वंस करता है। वह "पापी" होता है जो सबकुछ जानते हुए पूरी धारणा को दूषित कर देता है।

विचार-परिवर्तन

अक्सर सुना जाता है कि पहले हम भी अच्छा सोंचते थे, अच्छी बातों पर टिके रहते थे लेकिन अब सामनेवाले को देखकर बदल गए। वो नहीं सुधरते तो हम क्यों अच्छे बने रहें।
एक तरह से सही लगता है। आसान भी है ऐसा सोंचना और करना।

सांख्य दर्शन कहता है कि दूध में ही दही के गुण छुपे होते हैं या यूँ कहा जाए कि दूध में दही पहले से विद्यमान रहता है। इस प्रकार यह कहना कि पहले अच्छा सोंचते थे और अब सामनेवाले को देखकर बदल गए, एक असत्य संभाषण है। वास्तव में पहले भी वह गुण मौजूद थे। दिख नहीं रहे थे क्योंकि एक झूठे, दिखावटी आवरण ने उन्हें ढंककर रखा हुआ था। 
और दरअसल यही असत्यता है जो सामने की असत्यता को देखकर रंग बदलने का दावा करती है। इस झूठे आवरण के कारण असफलता अवश्यम्भावी है। दोष भले सामनेवाले पर पूर्णतः थोप दिया जाए। 
पहले आवरण की ओट में झूठ बोला जाता है और बाद में अपनी पूर्व की कभी न हुई अच्छाई को दिखाने का मिथ्याचार किया जाता है।

भगत सिंह पर दावेदारी

ठेकेदारी लेने की होड़ है। कोई विचारों के नाम पर हस्तक्षेप बरदाश्त नहीं करता तो कोई उत्सर्ग में अपने अस्तित्व का कारण ढूंढता है। 
मेरी समझ से विचार के आधार पर हस्तक्षेप न सहन करनेवाले अधिक दोषी हैं। विचार किसी को महान तो बना सकते हैं ,मगर युगप्रवर्तक नहीं। उत्सर्ग का भाव ही सदियों तक जीवित रहता है। विचारों के ठेकेदारों से भी बचने की जरुरत है।

...... पिछले साल इसी दिन का लिखा-
भगत सिंह कम्युनिस्ट क्या हुए आपने तो उन्हें बंधक बना लिया। एक विचारधारा के दायरे में कैद कर लिया और तंज कसने लगे उनपर जो उनकी सोंच के न थे । 
भगत सिंह को कोई उनकी विचारधारा के कारण सम्मान नहीं देता। सम्मान त्याग का होता है, उत्सर्ग का होता है, लक्ष्य का होता है और यह किसी एक विचार की थाती नहीं। आप तो इठलाकर दूसरों को ऐसे दुत्कारने लगे मानों भगत सिंह को उनसे छूत लग जायेगी। वैसे यह ध्यान रहता तो बेहतर होता कि भगत सिंह आदि ने वैचारिक भिन्नता के बावजूद लाला लाजपत राय के लिए सांडर्स को मारा था। लाला जी के विचार क्या थे वह आपसे छुपे नहीं होंगे ।
आप तो ऐसे नहीं थे - आप ऐसे ही थे जनाब।

*भगत सिंह को लेकर गांधी से भी ज्यादा मारामारी है। कारण स्पष्ट होते हुए भी नहीं दिखते। 

आस्था बनाम तर्क

यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में एक प्रसंग है-
तर्कों अप्रतिष्ठः श्रुति र्विभिन्ना
नैको मुनिर्यस्य वचनं प्रमाणम् ।
तर्क को उसकी सीमा दिखाता यह श्लोक बहुत कुछ कह जाता है। हालाँकि इस प्रसंग को उद्धरित करना एक तरह से आस्था है जिसे स्वीकार करना चाहिए। फिर भी प्रश्न तो उठते ही हैं।
किस तर्क की बात करते हैं आप? अपने जन्म से लेकर जीवन के हर क्षण को क्या तर्कों में तौला जा सकता है? किस बिंदु को आधार बनाकर तौलेंगे ? किसी न किसी बिंदु को तो आधार बनाकर उसपर आस्था रखनी ही होगी। फिर तर्क ही सत्य कैसे हो गए ? और इन तर्कों पर आधारित रेशनलिस्ट होने का भाव जो एक सुर से प्राचीनता को अतार्किक कहकर ख़ारिज कर देता है, कैसे तर्क पर आश्रित है ?
हो ही नहीं सकता।
प्रतीकों का महत्त्व इसी कारण है। प्रतीक आस्था के अंग हैं। जो इन प्रतीकों को ख़ारिज करते नजर आते हैं, वह भी एक रेशनलिस्ट होने की "आस्था" पर आश्रित रहते हैं।

रविवार, 19 जून 2016

कहानी साउथ अफ्रीकन इंडियन की।

"पहले हम उनके समान गोरे नहीं थे और अब हम इनके समान काले नहीं हैं। "
..... कहानी साउथ अफ्रीकन इंडियन की।
1994 साउथ अफ्रीका के लिए अपारथाइड समाप्ति को लेकर आया। ख़ुशी की लहर थी। वहां के भारतीय मूल के निवासी भी इस ख़ुशी में शरीक थे। अपारथाइड को उन्होंने भी झेला और उसके विरुद्ध संघर्ष किये थे। नेल्सन मंडेला की कैबिनेट में कई शामिल किये गए। मंडेला ने कहा भी था - समस्याओं के समाधान में इंडियन भागीदार हैं , वह स्वयं समस्या नहीं हैं।
बाद में क्या हुआ ?
ब्लैक मूलनिवासियों के लिए अफ्फर्मेटिव एक्शन कार्यक्रम चलाये गए जिनसे इंडियन को दूर रखा गया। इंडियन एक बार फिर अपारथाइड सा महसूस करने लगे। इनके इस भाव को बढ़ावा दिया ब्लैक मूल निवासियों के बीच इन इंडियन के प्रति बढ़ती घृणा ने, वह घृणा जिसके वास्तविक कारण तो उनकी स्वयं की ख़राब स्थिति थी पर जो ऐतिहासिक रंग लेकर आई थी।
ऐतिहासिक, हाँ, ऐतिहासिक कारण वह थे जो रंगभेदी सरकार की फूट डालो और शासन करो नीति के तहत पैदा हुए थे। पॉपुलेशन रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत सबको अलग कॉलोनी में बसाया गया। कुछ इंडियन अपने व्यापार के कारण समृद्ध होने लगे थे। ब्लैक लोगों ने इस कारण उन्हें शोषक के रूप में देखना शुरू कर दिया। जबकि हकीकत उन ब्लैक लोगों से अधिक जुदा नहीं थी। फूट पड़ चुकी थी। दंगे तक हुए।
बावजूद इसके कि इंडियन की कई नगरीय कांग्रेस ने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस और UDF को खुला समर्थन दिया, कई सालों तक जेल में रहे, अब इन्हें कालों में नहीं गिना जाता। अब इनसे इनकी पहचान पूछी जाती है कि आप इंडियन हैं , साउथ अफ्रीकन इंडियन हैं या सिर्फ साउथ अफ्रीकन हैं। जाहिर है गरीबी, बेरोजगारी ने राष्ट्रवाद को चरमोत्कर्ष तक पहुंचा दिया है। अब ब्लैक लोगों की प्रॉब्लम का दायरा खान-पान, रहन-सहन से लेकर उनके जीवन के हर पहलु तक पहुँचने लगा। हमले शुरू हुए। बड़े-बड़े धन्ना तो अपनी सुरक्षा में सक्षम थे पर इस कारण मध्यम और निम्न वर्ग अपनी-अपनी कॉलोनी में सिमटने लगे। यह अपारथाइड का नया संस्करण है।
आरोप यह भी लगाए जाते हैं कि इंडियन ने वाइट - माइनॉरिटी अलायन्स को चुनावों में वोट दिए थे। कुछ हद तक सही भी था। वह ब्लैक-लोगों की अपने से घृणा समझते थे। वाइट लोगों को वोट देना अर्थात एक तरह से राष्ट्रद्रोह। क्यों न पूछी जाए ऐसों से उनकी पहचान ! महात्मा गांधी की पोती इला गांधी ( एक MP) तक को भारतीय पहचान पर स्पष्टीकरण देना पड़ा - "मैं साउथ अफ्रीकन हूँ, एक गौरवान्वित साउथ अफ्रीकन। भारतीयता संस्कृति के स्तर तक आती है, हम क्या खाते हैं, किस तरह से खाते हैं, क्या संगीत, नाटक, भाषा पसंद करते हैं। इन विविधताओं से हम "अपने" देश का संवर्धन ही कर रहे हैं। मूलतः मैं यही कहना चाह रही हूँ कि हमारी भारतीयता यहीं समाप्त हो जाती है। "
सच ही कहा था इला ने। इनके तो अब पुरखे भी भारत में ढूंढे नहीं मिलते।
ब्लैक वही कर रहे जो उनके साथ कभी हुआ था।
अस्वाभाविक नहीं एक साउथ अफ्रीकन इंडियन का यह कहना कि इससे तो अच्छा अपारथाइड था।
कहानी कुछ सुनी-सुनाई लग रही है न, अपनी सी।



मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

रिसर्च पालिसी



रूस ( तब का USSR)में कभी एक वैज्ञानिक हुआ था। नाम था लयसेंको(Trofim Lysenko) । जनाब बायोलॉजिस्ट और अग्रोनॉमिस्ट थे। इनकी खोजी तकनीक आज भी vernalisation के नाम से जानी और पढ़ाई जाती है ( ठन्डे तापमान के प्रभाव से फ्लोवेरिंग पीरियड बढ़ जाता है और इसके कारण ग्रेन फिलिंग अधिक होती है। फलतः उपज में वृद्धि होती है ) । शुरुआत में इस तकनीक से बहुत लाभ मिला ( लाभ या प्रोपेगंडा ?) । कृषक पृष्ठभूमि से आते थे और इस पृष्ठभूमि का लाभ उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन के रूप में मिला । जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं वह समझ सकते हैं कि किसानो के समर्थन की कितनी जरुरत कम्युनिस्ट पार्टी को थी। दरअसल यह पार्टी किसानो को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रही थी। खैर, स्टालिन की छत्रछाया में लयसेंको देश के सर्वोच्च वैज्ञानिक पद तक पहुंचे। कहानी अब शुरू होती है।


लयसेंको ग्रेगोर मेडल ( फादर ऑफ़ जेनेटिक्स) के प्रबल आलोचक थे । इन्होंने एक अपना सिद्धांत खड़ा किया और उन सभी वैज्ञानिकों को जो मेंडल के पक्ष में थे , चुन चुनकर या तो कारावास पहुंचा दिया या फिर मरवा दिया। सोवियत संघ में अब केवल वही बायोलॉजिकल रिसर्च चल सकते थे जो सरकार की नीतियों के अनुरूप हों , वो सरकार की नीतियां जो गरीबोन्मुखी और रोजगारपरक थीं ।

जब तक स्टालिन रहा , लयसेंको की आलोचना राष्ट्रद्रोह थी। ख्रुश्चेव के हटने के बाद पहली बार प्रस्ताव पारित कर वैज्ञानिक समुदाय ने लयसेंको की आलोचना की और साफ़ साफ़ कहा कि रूस की नीतियों के कारण आज दूसरे देशों की तुलना में बायोलॉजिकल रिसर्च दशकों पीछे चला गया है । सच में चला भी गया था।

मैं यह आज ही क्यों कह रहा हूँ ? आज ही सरकार का फैसला आया है जिसका सार यह है कि उसी रिसर्च को फंडिंग मिलेगी जो सरकार की नीतियों के अनुसार होंगे । रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा सेल्फ फंडिंग की बात भी है । इस कदम से सबसे ज्यादा प्रभावित युवा विज्ञानी ही होंगे । यह "देहरादून डिक्लेरेशन" अगर प्रभावी हुआ तो भारत में हो रहे रिसर्च के ताबूत की कील साबित होगा । ताबूत इसलिए कहा क्योंकि पहले से ही भारत GDP का दो प्रतिशत भी निवेश नहीं कर रहा इसपर । बातें तो विकसित देश बनने की होती हैं जो कम से कम 10% खर्च करते हैं ।

बड़ी चतुराई से लोगो के मन में भर दिया गया है कि यहाँ रिसर्च होते ही नही या यह विलासिता हैं । शायद वह भूल जाते हैं कि 1947 में 50 m टन अनाज उपजाने वाला भारत आज 250 m टन उपजाकर सवा अरब आबादी को खिला रहा है । जमीन तो नही बढ़ी या आसमान से अनाज तो नही टपके ।
व्यावसायिक लिंक बनाएंगे तो रोजगार बढ़ेंगे । ..... जरूर बढ़ेंगे लेकिन एकोन्मुखी शोध अंततः उन्हीं व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का गुलाम बनाकर छोड़ेगा । यह भी ध्यान रहे कि नई तकनीक हमेशा वो लाएंगे और हम चिर ग्राहक बनने को अभिशप्त रहेंगे ।

चींटियाँ

इस दीवार में दरारें हैं
कटी फटी बेतरतीब सी।
एक सीध से उनमे आती-जाती-खोदती
चींटियों की कतारें हैं।
उस नन्हे पौधे को एक दिन
दरख़्त बनना है।
जम आई मिट्टी पर
फैलती सिकुड़ती उसकी जड़ों को
चींटियों की लाश तक से नमी सोखना है।
एक घोसला भी दिखने लगा है।
चींटियों को चुगती एक चिड़ी नजर आई।
उसके उड़ते ही बड़ी चींटियों का रेला
छोटी नवजात चिड़ी की चाह में,
बिना सीध-असीध की परवाह किये
घोसले की ओर बढ़ने लगा है।
- - - - - - - - - - - -
इन दरारों से झाँकने पर अब
किसी पुराकालीन दीवार के अवशेष मिलते हैं।
उस दरख़्त की जड़ों में अब
अनेक प्रकार के जीव रहते हैं।
शाखाओं पर पक्षी का डेरा है।
हाँ , उस कभी शांत -स्थिर दीवार पर अब
अराजक जंगल का बसेरा है।
अब सिर्फ चींटियाँ ही नहीं रहतीं।
चींटीखोरों का कुनबा बसता है।
और चींटियाँ का सीधा प्रवाह अनुशासन से नहीं ,
उन चींटीखोरों के डर से सरकता है।
The White Man's Burden / कॉलोनी के लोगों को सभ्य बनाता / स्नान और सफाई का महत्त्व समझाता हमारा अपना Pears सोप ; 19वीं सदी के उत्तरार्ध का एक विज्ञापन -
विज्ञापन में यूनिफार्म पहना एक ऑफिसर ( कंधे पर बार बना हुआ है ) Pears सोप से हाथ धो रहा है जो यह दिखाता है कि वह सभ्य है। वह एक शिप पर है। बाएं नीचे शिप का दृश्य अंकित है जो यह दिखाता है कि वह विश्व यात्रा पर निकला है और साथ में Pears सोप ले जा रहा है। दायें नीचे वह Pears सोप कॉलोनी में वहां के नेटिव को देता है जो उसके सामने समर्पण मुद्रा में हाथ फैलाये झुका हुआ है। उसकी काली त्वचा और पश्चिमी कपड़े का अभाव उसी असभ्यता को दर्शाता है।
कुछ सन्देश भी विज्ञापन पर अंकित हैं जो सफाई/ स्वच्छता को बड़ा गुण बताते हुए यह कहते हैं यह गोरे लोगों की जिम्मेदारी है कि वो यह सन्देश सभी जगह पहुंचाएं। सन्देश आगे कहता है कि सभी देशों के सभ्यों में Pears सोप का स्थान सर्वोच्च है , एक आदर्श सोप के रूप में स्थापित है। यह एक प्रबल तत्व है जो सभ्यता के विकास के दौरान धरती के अंधियारे कोने में उजाला ला सकता है।
*"The White Man's Burden" रुडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्द कविता है।



Original title: "The White Man's Burden: The United States and The Philippine Islands
Take up the White Man's burden, Send forth the best ye breed
  Go bind your sons to exile, to serve your captives' need;
To wait in heavy harness, On fluttered folk and wild—
  Your new-caught, sullen peoples, Half-devil and half-child.

Take up the White Man's burden, In patience to abide,
  To veil the threat of terror And check the show of pride;
By open speech and simple, An hundred times made plain
  To seek another's profit, And work another's gain.

Take up the White Man's burden, The savage wars of peace—
  Fill full the mouth of Famine And bid the sickness cease;
And when your goal is nearest The end for others sought,
  Watch sloth and heathen Folly Bring all your hopes to nought.

Take up the White Man's burden, No tawdry rule of kings,
  But toil of serf and sweeper, The tale of common things.
The ports ye shall not enter, The roads ye shall not tread,
  Go mark[14] them with your living, And mark them with your dead.

Take up the White Man's burden And reap his old reward:
  The blame of those ye better, The hate of those ye guard—
The cry of hosts ye humour (Ah, slowly!) toward the light:—
  "Why brought he us from bondage, Our loved Egyptian night?"

Take up the White Man's burden, Ye dare not stop to less—
  Nor call too loud on Freedom To cloak your weariness;
By all ye cry or whisper, By all ye leave or do,
  The silent, sullen peoples Shall weigh your gods and you.

Take up the White Man's burden, Have done with childish days—
  The lightly proferred laurel, The easy, ungrudged praise.
Comes now, to search your manhood, through all the thankless years
  Cold, edged with dear-bought wisdom, The judgment of your peers!


किसके गांधी ?

किसके गांधी ?
आज विरोधियों पर लिख नहीं रहा। विरोधियों से डर नहीं लगता साहब , समर्थकों से लगता है।


आज संघी भी गांधी को अपनाने को तैयार बैठे हैं। वामपंथी कब के मजबूरीवश अपना चुके। आज़ादी के पहले अल्पसंख्यकों के लिए अछूत हो चुके गांधी आज़ाद भारत में उनके लिए सहारा हो गए , कम से कम आरंभिक वर्षों में। नेहरू समर्थकों के लिए गांधी श्रद्धापुरुष बने रहे। समाजवादियों ने भी उनको सम्मान दिया। गांधीवादी तो थे ही।

अपनाने की मजबूरियों की बात को किनारे कर दें तो क्या लगता है ? यही न , कि गांधी संघी भी थे , वामपंथी भी , अल्पसंख्यक समर्थक , समाजवादी और गांधीवादी भी। और आस्तिक और नास्तिक दोनों।

ऐसा कैसे हो सकता है ?

या तो यह व्यक्ति मल्टीप्ल पर्सनाल्टी डिसऑर्डर का शिकार था या फिर अवसरवादी। या एक समग्र इंसान जिसकी बातों को अपने हिसाब से हमने उपयोग किया।

कोई सिर्फ उनके क्रिस्चियन मिशनरियों के विरोध को अपनाता है तो कोई धर्मनिरपेक्ष तत्व को। कोई गौहत्या विरोधी रूप को दिखाता है तो कोई गौहत्या पर पाबन्दी न लगवाने के समर्थन में। कोई सिर्फ अार्थिक सिद्धांत को उद्धृत करता है तो कोई अम्बेडकर विरोधी छवि को भुनाता है। कोई "अंतिम आदमी तक स्वराज " को प्रदर्शित करता है तो कोई पूंजीपति समर्थक छवि दिखाता है। कोई "राम मंदिर " तक में उनका प्रयोग करता है तो कोई "राम मंदिर" के विरोध में। और कोई बस सफाई करवा के खुश होता है।

अपने अपने गांधी।

सवाल फिर वही - किसके गांधी ?

शायद गांधी किसी के नहीं हैं इनमे। गांधी स्वयं अपने भी नहीं थे। न गांधी को हिन्दू धर्म से अलगकर समझा जा सकता है , न ही उन्हें सर्वधर्मसमभाव से जुदा किया जा सकता है। न आधुनिकता के साँचे में उन्हें देखा जा सकता है , न ही परंपरानिष्ठा में ढाला जा सकता है। न ही क्षद्म आस्तिकता और न ही क्षद्म नास्तिकता सही दृष्टि से देख सकती है।

सच सबमे है , किसी भी विचारधारा के हों। पर पूर्ण सत्य कोई नहीं। यदि आप अपनी विचारधारा (?) , यदि हो , ( अमूमन होती नहीं , बस नक़ल करते हैं ) , को पूर्ण सत्य मानते हैं तो अफ़सोस , कभी सत्य जान नहीं पाएंगे।

क्या लिखूं और !! होड़ लगी है यहाँ बाजार में। पब्लिक के हिसाब से पोलिश करो , पक्का बिकेगा।

मंगलवार, 19 मार्च 2013

मैं गोलियाँ बेचता हूँ


मैं गोलियाँ बेचता हूँ, गोलियाँ, बंदूक वाली नहीं, सपनों की. तरह-तरह के रंग-बिरंगे अच्छे लगनेवाले सपनों की, वो भी बिल्कुल मुफ्त. पूछोगे मुफ्त क्यों ? मैं कहूँगा कि भई तुम्हारे सपने से मुझे भी सुकून मिलता है. मैं भी नये जोश और ताजगी से भर उठता हूँ. फिर पूछोगे कि यह कैसे होता है? भई, कहानी लम्बी है, छोटी कर सुनाता हूँ.

मैने कईयों को सपने दिखाये हैं. लोग कहते हैं कि सपने देखो, तभी आगे बढोगे. यही सोंचकर मैने एक निर्धन को सपना दिखाया धनवान होने का. दुनिया आज उसे एक बड़े बिजनेसमैन के रूप में जानती है. तुम्हारे पड़ोस के मटरु को भी यही सपना दिखाया था. पर उस मुए ने शायद मुफ्त देखकर ज्यादा गोलियाँ खा लीं. अभी तक सपने में ही पड़ा है.

जिसे जैसा चाहिये, वैसा ही देता हूँ. हिन्दू को मुसलमान की और मुसलमान को हिन्दू की गोलियाँ देता हूँ. सवर्ण को आरक्षण की और अवर्ण को हुये अत्याचार की गोलियाँ देते मुझे बड़ा सुकून मिलता है. नेताओं को कुर्सी की और मीडिया को आकर्षित करनेवाली गोलियाँ पसंद हैं.

कौन कहता है कि गधे नहीं सोंचते, सपने नहीं देखते. मेरी सबसे ज्यादा गोलियों की खपत गधे ही करते हैं. आसपास की घटनाओं को देखते हुये भी निर्विकार भाव से जुगाली करनेवाले गधे सदिओं से मेरे सर्वप्रिय ग्राहक रहे हैं, आज भी हैं. अन्धे भी स्वप्न देखते है, पर थोड़े अजीब से. मेरी स्वप्न गोलियाँ उन्हें ऐसी दुनियाँ में ले जाती हैं जहाँ हर सच के पीछे उन्हे झूठ दिखाई देता है और वह झूठ कुछ समयोपरान्त सच में तब्दील हो जाता है. ऐसी कितनी गोलियाँ मैने कितने अंध-देश/ धर्म/ सम्प्रदाय.....भक्तों और छद्म-धर्मनिरपेक्षों को बेचीं, अब तो मुझे याद भी नहीं. पर मुझे इस बात का दुख है कि मैं कुछ देशभक्तों और निरपेक्षों को अपनी इच्छानुसार गोलियाँ नहीं खिला पाया.

एक समझदार मिल गया था रास्ते में. मुझे कुछ-कुछ समझने सा लगा था. आव देखा न ताव, मैने उसे ऐसी गोली दी कि वो अब तक चुप है. ये समझदार लोग भी ना...उफ ! सारा बिजनेस ही ठप्प कर देंगे.  एक समझदार भला ऐसा भी था जिसने मुझे ही अपने रंग में रंग दिया. मुझे ही गोलियाँ देता और बंटवाता. मारा गया बेचारा.

कुछ लोगों को बासी, पुरानी एक्सपाइर्ड गोलियाँ ही पसंद आती हैं. मैं उन्हें नई कोटिंग कर नये पॅकेट में डाल कर उन्हें खिलाता हूँ. ये लोग अक्सर गड़े मुर्दे उखाड़ते नजर आते हैं इतिहास की कब्रगाह में. देखो मुझे दोष न देना. कोटिंग से मुझे याद आया कि कई बार ऐसा होता है कि गोलियाँ कम पड़ने लगती हैं किसी-किसी के लिये. आपातकालीन व्यवस्था भी तैयार रहती है. किसी पर हरे तो किसी पर लाल कोट कर छितरा दिया करता हूँ.

ऐसा नहीं है कि गोलियों का साइड एफेक्ट नहीं होता. कभी-कभी अधिक मात्रा लेने से या अनुपयुक्त वातावरण के प्रभाव से, गलत गोलियाँ खा लेने से और या फिर अलग-अलग गोलियाँ एक साथ ले लेने से रिएक्सन हो ही जाता है. एक गधे को भौंकने की बीमारी लग गई. दो अलग-अलग गोलियाँ ले ली थीं. इलाज तो नहीं हुआ पर जनाब आजकल चिड़ियाघर की शोभा बढ़ा रहे हैं. सुना है कि गधों के न भौंकने के लिये कानून में संशोधन पर विचार हो रहा है. बेचारी जनता और उसका भौंकना सोशियल मीडिया पर.

कहोगे कितना कमीना हूँ मैं. कितना गिरा हूँ मैं. इतना गिरा कि तुम्हें ही गिराता हूँ. मारने आते हो. पिंजरे में कैद कर देना चाहते हो. उफ! मैने दिमाग बंद करने की गोली क्यूं नहीं बनाई ? क्यूं ऐसा होता है कि तुम मेरी सुनना बंद कर देते हो ? मैं तो बस सपने दिखाता हूँ, करते तो तुम्ही हो.

...........ठीक समझा तुमने. मैं तुम्हारा ही दिल हूँ. मैं ही तुम्हें सपने दिखाता हूँ........................मेरे को क्या, तुम बर्बाद हो या आबाद. दिमाग तो है न तुम्हारे पास.

बिहार, एक नजर



बड़ा ही जटिल प्रश्न है कि आखिर क्यों उत्तर प्रदेश और बिहार विकास की दौड़ में पिछड़ गये. गंगा-यमुना से सिंचित विश्व की सबसे ज्यादा उर्वर मिट्टी
रामकृष्णबुद्धमहावीरकबीर,सुफ़ीओं आदि के संस्कारों से सजी संस्कृतिऔर कभी अखिल भारत की राजधानी रही धरती.......क्या हो गया आखिर ?


संक्षेप में कहूँ तो सबसे पहला कारण दिखता है समाज में जड़ तक समाया जातिवाद. अब प्रश्न यह उठता है कि जातिवाद यहीं ज्यादा क्यों कारण यह है कि ब्राहमणवादी सत्ता का केन्द्र होने के नाते (वाराणसी इत्यादि) वर्ण व्यवस्था और उसकी अनुगामिनी जाती-प्रथा का सबसे ज्यादा प्रभाव इन स्थानों पर पड़ना स्वभाविक थाहै. जाति इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी कि स्वयं वर्ण या जाति (ब्राह्मणक्षत्रिय इत्यादि) भी उपजाति में विभक्त हो गयी और उनमें परस्पर वैवाहिक सम्बंध भी कमने लगे. हर उपजाति के अपने नेताअपने-अपने स्वार्थ कटुता की नयी उँचाइओ को को छुने लगे. इसका असर आज भी है. इतनी ज्यादा जटिल सामाजिक व्यवस्था कहीं नहीं है. दक्षिण भारत में दो ही टुकड़े हैं समाज के मूलतः-ब्राह्मण और अब्राह्मण. पंजाबहरियाणाहिमाचल इत्यादि में सिखों का प्रभाव हैशायद इसलिये वहाँ इसका प्रभाव कम है.

दूसरा कारण था ईस्ट इंडिया कंपनी. संयुक्त बंगाल-बिहार-ओडिशा की दीवानी का अधिकार मिला था कंपनी को. यहीं से शुरु हुआ शोषण का सिलसिला. नबाब भी कर वसूलता था और कंपनी भी. सारे उद्योग-धंधे बंद हो गये क्योंकि देशी व्यापारिओं को हर जगह महसूल देना पड़ता था जबकि अंग्रेज़ इससे परे थे. यह वही समय था जब भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा अकाल पड़ा था और लाखों लोग भूख से मारे गये थे. कभी कुटीर उद्योग का बड़ा केन्द्र रहा यह क्षेत्र कभी भी इससे उबर नहीं पाया.

तीसरा कारण है संसाधनों का विकेन्द्रीकरण. संसाधनों  से धनी बिहार के संसाधन बिहार में ही नहीं पाये. कलकत्तामुम्बई आदि से यहाँ के संसाधनों का संचालन होने लगाआज भी झारखण्ड से हो रहा है.  देश में कोई भी चीज़, कोई भी संसाधन कहीं पर भी होती हो, इकट्ठा तो एक ही जगह होनी थी चाहे कलकत्ता में या फिर मुंबई में. विदेशी व्यापार जो चलाना था ईस्ट इंडिया कंपनी को. यहीं से शोषण शुरू हुआ बिहार जैसे संपन्न प्रदेशों का. कलकत्ता और मुंबई में रहनेवाले अंग्रेज और व्यापारी आमीर और अमीर होते चले गये, मुंबई महानगर बन गया. बिहार पिछड़ गया. ये आंतरिक उपनिवेशवाद का नया पहलू था. ये आज भी बदस्तूर जारी है. जैसा कि मैने पहले कहा कि खनिज यहाँ के, खनिज निकालनेवाले यहाँ के, पर व्यापारी बाहर के, बाज़ार बाहर के. संपन्न कौन होता ?

यह माना जाता है कि आज़ादी के बाद बिहार और उत्तर प्रदेश को एक मानक  चिन्ह बना दिया गया था अन्य राज्यों के लिये जो ज्यादा पिछड़े थे. शायद यह प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि पर  दिए विशेष ध्यान का असर था .  बाद में यही देखकर राज्य को केन्द्र से सहायता मिलनी कम हो गयी ( मैने इसे फ्रंटलाइन में पढ़ा था कभी). अन्य राज्य बढते गये,बिहार पिछड़ता गया.

भारी उद्योग भी कम खोले गये. जो भी केन्द्र सरकार ने खोलेअब अधिकांशतः सफेद हाथी बन चुके हैंया फिर बंद हो गये. केन्द्र ने फिर कभी ध्यान नहीं दिया. अर्थव्यवस्था सिर्फ कृषि पर आधारित रह गयीउसपर भी जब बिहार राज्य की आधे से ज्यादा कृषि-योग्य भूमि बाढ के चपेट में हो. हरित क्रांति के समय भी यह क्षेत्र उपेक्षित रहा था. सिंचाई की व्यवस्था बिल्कुल थप थीआज भी है.विभाजन के बाद बिहार कृषि -प्रधान ही रह गया है . उसपर भी राज्य की अधिकांश भूमि हर साल जल-प्लावन का शिकार बनती है. हिमालय के शिखरों से निकली नदिओं के उत्पात का कोई तोड़ अभी तक ढूंढा न जा सका है . उसपर भी केंद्र की इस मसले पर उदासीनता . नेपाल के इस मामले में शामिल होने से बिहार सरकार स्वयं कुछ नहीं कर सकती . दुःख की बात यह है कि इतने जल स्रोतों के होने के बावजूद इसका उपयोग पनबिजली बनाने में करना एक घाटे का सौदा है क्योंकि बिहार समतली क्षेत्र है.
एक और बाढ़ आती है तो दक्षिण  बिहार सूखे से ग्रस्त रहता है . ऊपर से दक्षिण बिहार में सिंचाई की सुविधाएं भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं .  पर  हाल फिलहाल में कुछ सुधार हुये हैं. इस साल हुई 250 mt उपज के लिये इसी क्षेत्र को उत्तरदायी माना जा रहा है.
नक्सल हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में से हैं यह राज्य. लगभग पूरा बिहार और उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर इलाके पूरी तरह से इस समस्या से ग्रसित हैं.

असमर्थ राजनीति भी एक अहम कारण है जिसका उदाहरण देने की जरूरत नहीं है.
लोगों के मुंह से सुना है कि सारी ट्रेन बिहार को ही जाती हैं. बिल्कुल गलत है. उत्तर बिहार को अगर ट्रेन की संख्या से तौलेंतो सम्पूर्ण भारत के निम्नतमों में शुमार होगा. दूसरी बात ट्रेन जरूरी भी है क्योंकि नक्सल प्रभावित क्षेत्र अभी भी कटे हैं. ऐसा भी नहीं की ट्रेन सारी बिहार से खोली गयीं बिहार के मंत्रिओं के द्वारा. अब कोलकाता वाली ट्रेन तो बिहार होकर ही जायेगी न. कुछ मुगलसराय वाली ट्रेन को थोड़ा आगे बढ़ा गया.

लोगों का आरोप है कि कुछ भी होता है और सारे बिहारी एकजुट हो जाते हैं. यह सरासर मिथ्या है. मैने आजतक बिहार के संगठन कम ही देखें हैं. बी एच यू से पढ़ा हूँ. बहुत सारे राज्यों के संघ थेपर बिहार बिल्कुल नहीं. हाँब्राह्मणराजपूतभूमिहारकुर्मी आदि के संगठन मिल जायेंगे.

बिहार के लोग कानून बड़े प्यार से तोड़ते हैं . मगर कमोबेश यही स्थिति सारे देश की है . एक और मिथक बन सा गया है कि बिहार से ही सबसे ज्यादा आईएएस आईपीएस  हर साल निकलते हैं . यह आत्मप्रवंचना है. ऐसे दावे करनेवालों से मुझे यही कहना है कि आप  upsc की वेबसाइट खोल कर देख लें .इस क्षेत्र में दक्षिण भारत के लोग काफी आगे हैं . बिहार की शिक्षा का  कबाड़ा कर दिया अंधाधुंध खुले घटिया महाविद्यालयों ने . मानों डिग्री मुफ्त में बंट रही हो . मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता जब ऐसे ही किसी कॉलेज से मास्टर डिग्री लिए को दिल्ली की गलियों में टमाटर बेचते देखता हूँ . कहने को तो पीएचडी भी कर लिया , पर दसवी कक्षा के बच्चों को पढ़ाने की कूवत भी नहीं . 

अब स्थिति पहले से काफी हद तक सुधरी  है . नीतीश कुमार के परिश्रम को नकारा  नहीं जा सकता . अपराध , किडनेपिंग काफी कम हो चुके हैं . जिस जगह लोग शाम के सात बजे निकलते नहीं थे और मार्किट भी  सात बजते ही बंद हो जाते थे , वहां  अब ठाठ से घूमते हैं .नौकरशाही पर सरकार का नियंत्रण बना हुआ है . डॉक्टर , शिक्षक अदि अब दिन भर ड्यूटी बजाते हैं . नीतीश का विरोध भी हुआ है , मगर वह ज्यादातर राजनितिक है और लोगों की इस भावना का प्रतीक है कि और विकास क्यों नहीं हुआ . खैर , नितीश रहें न रहें , हारें  या जीतें ,  किसी  भी पार्टी की सरकार बने , मुद्दा विकास ही रहेगा . यह एक शुभ संकेत है .